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जयपुर के ओज कवि अशोक राय वत्स की नई रचना ” सम्मान नाम ही पाते हैं”

“सम्मान नाम ही पाते हैं ”

वर्दी पर उसका नाम लिखा था जब उसने बलिदान चुना था।
नाम से ही पहचान हुई थी, जब उसने मुक्ति धाम चुना था।।
उसी नाम को लेकर इतनी चर्चाओं का बाजार सजा है,
लगता है इस वसुधा पर बस निंदा काम बचा है।

कुछ नेताओं ,अभिनेताओं ने जिव्हा को फिर से खोला है।
उनके शब्दों ने पुनः देश में विष का बिरवा रोपा है।
नाम लिखा जाता है घर पे नाम ही पहचान बताता है।
एक दुष्कर्मी और अधर्मी अपनी पहचान छुपाता है।

जब पाप नहीं किया तुमने क्यों पहचान छुपाते हो।
अपने पुर्खों की गरिमा को मिट्टी में आज मिलाते हो।
नागफणी हो या हो आम दोनों ही नाम विटप के हैं।
लेकिन विनम्रता के बल पर बस आम सराहे जाते हैं।

अपने विचार सत्कर्मों से कलाम घर घर में इज्जत पाते हैं।
अपने आदर्शों के बल पर दशरथनन्दन प्रभु श्रीराम बन जाते हैं।।माना जीते जी दुनिया में हम कर्मों से जाने जाते हैंलेकिन दुनिया से जाने पर सम्मान नाम ही पाते हैं।

ओज कवि, अशोक राय वत्स ©®

जयपुर, 8619668341

ASHOK KUMAR RAI JAIPUR RAJASTHAN

ओज कवि, पत्रकार , "अपने ही लहू से तिलक लगा माता का भाव सजाता हूं "
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